विकल्प
नहीं होता जब कोई विकल्प
तो होता है एक संकल्प
दूर से दिखती हुई लौ
पूरे रस्ते का सहारा होती है
बेपरवाह हम चल पड़ते हैं
न राह का पता होता है
न ही राह में आने वाली घटनाओ का…
कोई हो जाते हैं रु-बा-रु लौ की गर्मी से
बन जाते हैं लौह-पुरुष कोई, तप कर… जल कर.
पर न जाने क्यों असमंजस होता है
जब कई सारे विकल्प सामने आते हैं.
संकल्प डगमगाने लगता है और लौ टिमटिमाने लगती है
अनिश्चित चित जाने कहाँ – कहाँ दौड़ लगा के आता है
सब कुछ करने की चाह में कहीं कुछ भी न कर पाएं
कहतें हैं की उम्र और बुद्धि की कभी भेट नहीं होती
क्यूकी उम्र रास्ते तलाशती है और बुद्धि मंजिल
और यदि उम्र को मंजिल मिल भी गयी,
तो वो उसे बस पड़ाव समझेगी मंजिल नहीं
लेकिन विकल्पों के खुले आसमान में
ना ही मंजिलो के लिया कोइ जगह है और ना ही पडावो के लिया
वहां तो बस रस्ते ही रस्ते हैं
और हर रस्ते के आखिरी-अँधेरे छोर पर
एक लौ टिमटिमा रही है.
hey neha , its good to see ur this kind of talent……..i loved ur poems………anyhow i m nt in ur contact……reply me…..k
कहतें हैं की उम्र और बुद्धि की कभी भेट नहीं होती
क्यूकी उम्र रास्ते तलाशती है और बुद्धि मंजिल..
Lovely lines..:)..keep going..