गुस्सा समाज से है या अपने आप से…
गुस्सा समाज से है या अपने आप से…
मुझे प्यार है अपने त्योहारों पर,
और गर्व है अपनी परम्पराओं से.
हमारी संस्कृति जिसमें गुथें हैं हर प्रकार के लोग…
क्या इन रंगीन नजारों के पीछे
भी एक औरत का हाथ है…
क्यूकी हर चमकता कंगूरा एक नीव की ईंट मांगता है…
ईंट पर क्या गुजराती है ये कोई नहीं जानता
बस इसी बात का डर है मुझे भी की कहीं नीव हटाने से
ये कंगूरा भरभरा कर न गिर पड़े.
ये कंगूरा जिसे हम भारतीय संस्कृति कहते हैं
मैंने कंगूरे पर चढ़ना शुरू किया है चुपचाप से.
गुस्सा समाज से है या अपने आप से…
kindly read the post open mind for the background story of this poem.
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