तिलचट्टा
देर रात ऑफिस से आके,
जैसे ही मैंने कमरे की लाइट जलाई.
किसी कोने से आके कमरे के,
एक तिलचट्टे ने छलांग लगाई
लगा सर फोड़ने वो ट्यूब लाइट के चारों ओर,
घर आते ही ये मुसीबत, मैं गुस्से से सराबोर.
दिन-भर की सरदर्दी से बचा- खुचा दिमाग मैंने लगाया,
और झटपट गेलेरी में जाके वहां का बल्ब जगाया.
फिर कमरे की लाइट की बंद,
और बोली,” मियां समरकंद!
बेगैरत तो तुम हो ही, जो एक लड़की के कमरे में आये घुस.
अब बहार निकलो चुपचाप और गेलेरी में करो खुश-फुश.
अब तिलचट्टा जाके गेलेरी में फोड़ रहा था सर,
पर कुछ ही सेकेंडो में बंद हो गयी सब सटर- पटर.
मैंने बहार जाके देखा तो वो छुपा बैठा था बल्ब के पीछे,
रौशनी से कोई रिश्ता नहीं उसे तो सर ढकना था अँधेरे के नीचे.
ये देख के मुझे बड़ी हंसी आई,
अरे यारो ये तो निकला अपना ही भाई.
चमकती चीजों के पीछे हम भी हैं भागते,
दिन-रात सुबह शाम उसी आस में हैं जागते.
पर जब सर टकरा- टकरा के
और दुनिया भर से लड़ के पहुँचते हैं रौशनी के पास,
तो जी चाहता है की बस
कोई अकेला अँधेरा कोना मिल जाए और कोई भी ना हो आस-पास.
this is very deep and poignant
love it!
Amzing..maza aa gaya..bahot badiya dost..
AWESOME!!
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